lnternational stammering Awareness Day ( ISAD )

वार्षिक उतसव आपको शायद पता होगा कि प्रत्येक वर्ष 22 अक्टूबर को lnternational stammering  Awareness Day ( SAD )मनाया जाता है। सरल शब्द में हकलाहट दिवस प्रत्येक वर्ष 22 अवटूबर् को मनाया जाता है। इस सेन्टर से ठीक होने के बाद स्थाई स्पीच होन पर कुछ चुनिन्दा व्यवितयो को वर्ष में एक बार आमंत्रिक किया जाता है तथा उनके सम्मानित किया जाता है तथा उनका इन्टरव्यू लिया जाता है। भारत के प्रमुख़ समाचार पत्रों में प्रकाशित करवाया जाता है तथा टी ,वी ,चैनलों में भी प्रसारित किया जाता है तथा स्थाए मेंबरशिप प्रदान की जाती है।   

              थेरेपी लेने के पहले
- यदि आप किसी थेरेपी सेंटरस / स्टंमेरिंग सेन्टर / सुपोर्ट ग्रुप /नेशनल कॉन्फरेंस में  थेरेपी लेने जाने की प्लानिंग कर रहे है  तो निम्न लिखित बातो का ध्यान रखना चाहिए
1 -समय----- टाइम ले कर जाना चाहिए क्यों की हकलाहट का ट्रीटमेंट चमत्कारी  मेथड से नहीं हो सकता  यदि आप टाइम ले कर नहीं जाते तो आप का मन घर में /ऑफिस में / स्कूल /कालेज में लगा रहेगा और आप सही तरीके से थेरेपी नहीं ले पाओगे  और आप को  किसी भी तकनीक पर विश्वास नहीं होगा अतः टाइम का प्रेशर  पैदा ना  होने दीजिये । आप के लिए आर्गेनाइजर  जो टाइम रिकमेंड किया है उतना टाइम दीजिये और लास्ट में एक बार कहिये की यदि और टाइम जी जरुरत हो तो मै  दे सकता हूँ। चुकी स्टंमेरिंग  एक आर्ट है यहाँ टाइम लगता है  

2 -मन  की एकाग्रता  -   रियल  बात यह है की कोई हकलाने वाला व्यक्ति इतना सहमा /डरा / संकोची  होता है की उसका विश्वाश किसी डॉक्टर / स्पीच थेरेपिस्ट / पर बिलकुल विश्वाश तो होता ही नहीं है यहाँ तक की उसे अपने आप पर भी विश्वाश नहीं होता है जब वह कोई टेक्निक सीख रहा होता है तब तब भी शंका में घिरा रहता है की मै  यह टेक्निक मेरे लिए ठीक है , यह मेरे काम की है की नहीं , वह सस्पेंस में रहता है  ।  तो मई आप को बिलकुल साफ साफ बोलुँगा की आप कही भी टेक्निक सीखिये मन से सीखिये , जो कोई टेक्निक सिखाई जाये तो पूरा मन को एकाग्र कीजिये ( मोबाइल /कॉल/ sms / फेसबुक / किसी फ्रेंड की याद /घर की याद / परीक्षा की चिंता को हाबी  ना  होने  देवें / मै कई  बार फील किया हूँ  की मेरे  बहुत से ऐसे PWs  है जो इन्ही  में खोये रहते है , और सारी  एनर्जी   इन फालतू की बातो में खर्च कर देते है  और टेक्निक सिखने को सब से लास्ट की लिस्ट में
रखते है ऐसी फर्स्ट लिस्ट में रखना होगा मन को एकाग्र करके सीखना होगा और रियल लाइफ में उपयोग करना होगा click 
3 - पैसा - दोश्तो यह सबसे बड़ा पैरामीटर है । हम सब बेटर सुविधा काम पैसे में खोजते है ( सही भी है ) पर रियल में यह पॉसिबल नहीं है  यदि कोई बहुत काम पैसे लेकर आप को थेरेपी दे रहा है तो कई सवाल खड़े होते है  सच्चाई  तो यह है की अच्छी सुविधा के लिए अच्छा पैसा खर्च करना पड़ता है फिर भी हमें गूगल भगवान से एक बार पूछ लेना चाहिए यह  गूगल से देख लेना चाहिए की किस किस सेंटर की कितनी फीस है क्या क्या सुविधाये है ,कौन कौन  सी तकनीक सिखाई  जाएगी , अनुभव कितना है , क्वालिफिकेशन कितना है , सेल्फ़  का हॉस्टल है की नहीं ,थेरेपी कितने घण्टे डेली होती है, सारी सुविधा से संतुष्ट  होने पर ही अपना अगला कदम बढ़ाना चाहिए  यदि किसी सेंटर की फीस अधिक है और  अच्छी सुविधा दे रहा है तो थेरेपी लेना चाहिए   क्लिक हियर 

4 - पता कीजिये की  स्पीच थेरेपी है /साइको थेरेपी/ या दोनों है ----- बहुत सारे स्पीच थेरेपिस्ट  केवल स्पीच थेरेपी 1 -2  घंटे डेली याद साप्ताहिक देते है  और कुछ नहीं सीखते है केवल धीरे  धीरे बोलना सीखा देते है  और बोलते है की ऐसे ही रियल लाइफ में बोलो जो पॉसिबल नहीं होता है , साथ में साइको थेरेपी भी जरुरी है जिस से आप का डर  निकलता है मेरे हिसाब से 7 प्रोसेस होती है  स्तम्मेरिंग को ओवरकम  करने के लिए  और   
 यही 7  आप की हेल्प करेगी

1 स्पीच थेरेपी 2 -साइको थेरेपी 3 - मेडिटेशन  4 मेडिकेशन  5  - adjuster ( optional ) 6 -सपोर्ट ग्रूप 7-hypnotherapy 8-Beahaviour modification therapy 


 जिस सेंटर में यह 7 प्रोसेस फॉलो की जाती हो वह एक अच्छा सेंटर माना जा सकता है 
5 - ऐसे बहुत सारे PWS  है जो अपने फैमिली को बिना बताये  ज्वाइन करते है  और सोचते है की अभी नहीं बताउगा ठीक होने पर बता दुगा ।  ऐसा करने से आप को काम फायद होगा क्यों की आप को आर्थिक ,सामाजिक पारिवारिक  मौहौल नहीं मिलेगा और यहाँ से जाने के बाद आप घर में रूल्स फॉलो नहीं कर पाओगे  और आप  समय / पैसा / मेहनत  सब बेकार  हो जायेगा । आप को अपनी फैमली मेंबर की हेल्प लेनी चाहिए
6 वर्षाती  मेढ़को से बच कर रखिये - बहुत सारे ऐसे भी लोग होते है जो थोड़ी दिन की थेरेपी या एक दो सपोर्ट ग्रुप या NC  अटेंड कर लिए और अपने आप को स्तम्मेरिंग एक्सपर्ट मानाने लगते है ।  कुछ लोग बहुत अच्छे भी है जो रियल में आप की हेल्प करेंगे , ऐसी बहुत  आर्टिकल्स /वेबसाइट/ब्लॉग /फेसबुक  में पेज है जो आधे अधूरे है लिखा कुछ है रियलिटी कुछ और ही है  ऐसे ही मुझे एक वेबसाइट मिली जिस को कॉल किया वह बोलता है मै  आप को ठीक कर दुगा मै  कंप्यूटर एक्सपर्ट हूँ बिजी हूँ २ वर्ष पहले साइट बना दिया था आप टाइम नहीं दे पता पर आप को ठीक कर दुगा आप मुझे कल सुवह सात बजे कॉल कीजिये । ऐसे बहुत सारे पेज है जो बना तो दिए गए है पर वर्क जीरो है  यहाँ पर आप अपना टाइम ख़राब करेंगे इस से बच कर रहना है "नीम हाकिम खतरे की घंटी " 
7 - यह सोच कर किसी  भी स्पीच  थेरेपी सेंटर में मत जाइये  की मै जब लौटुँगा हो 100 % ठीक हो कर लौटुँगा , जैसे किसी व्यक्ति के ऑपरेशन के जस्ट  बाद 100 % गुड फील नहीं करता, कुछ दर्द , कुछ तकलीफ  रहती है  किसी किसी की प्रॉब्लम ऑपरेशन के बाद बढ़ भी जाती है कुछ समय के लिए   घर जा कर कुछ दिन तक मालिश पट्टी दवाई खाने से धीरे धीरे आराम मिलना चालू हो जाता है । ठीक वैसे ही हकलाहट में होता है थेरेपी लेने के बाद कुछ दिन आप को घर में भी मेहनत करनी ही पड़ेगी  आप चाहे (थेरेपी/ सपोर्ट ग्रुप /नेशनल कॉन्फरेंस में  ) कही भी ले  पर  घर में केयर  करना ही पड़ेगा,  रियल लाइफ में तकनीक का उपयोग करना ही होगा 
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         आप को क्या करना चाहिए

    A -स्वयं समस्या के साथ स्वीकार करें ;                                           
ऐसा करने पर मह निरन्तर जूझने,छिपाने की प्रवृति तथा शर्म के अहसास से मुक्त हो जाते है और तब हमारा मन व मसितष्क खुलकर बोलने के लिये आजाद हो जाता है। कई व्यवित्यो ने माना है कि समस्या को स्वीकार करने के बाद उनकी वाणी निशिचत रूप से बेहतर हुई है मगर इसके लिये हमें स्वयं से ईमानदार और विन्रम बनना पड़ेगा। हमें  यह स्वीकार करना पड़ेगा कि इस जीवन के सतत नाटक में हर किसी को भिन्न -भिन्न भूमिकाऍ मिली है। इन भूमिकाओं में कभी फायदा तो कभी नुकसान छिपा हो सकता है मगर ये दोनों ही वस्तुतः अस्थाई है जब हम अपनी भूमिका स्वीकार कर लेते है तो कोई संघर्ष नही रह जाता अन्यथा हकलाने वाला व्यवित सदैव सामान्य व्यवित की भूमिका अदा करने का प्रयास करता रहता है जिससे उसके मन में एक दुविधा (रोल कानपिल्क्ट )बनी रहती है, इस दिशा में पहला कदम हैं -अपने निकस्थ लोगों (पत्नी , पति ,माँ ,बाप ,घनिष्ठ मित्र ) से  इस बारे में बात करें फिर धीरे-धीरे इस विश्वास के दायरे को बढ़ाऍ।

-----------------------------------------------------------------------------------------                   B-बचने की प्रवृति से छुटकारा पाये ;
दिन-प्रतिदिन हकलाहट से बचने के लिये हमे कई चीजो से कतराते रहे है जैसे-कक्षा में जबाब देने-अजनबियों से बात करना-फोन करना या फोन का जबाब देना-नेत्व्त्व वाली भूमिकाओ से बचना आदि। कठिन शब्द के बजाय कहने में आसान शब्द का प्रयोग करना-भले ही उससे अर्थ कुछ भिन्न हों जाये औरो की मौजूदगी में प्रश्न न पूछना-अपनी बात न रखना आदि। बचने (अवाएडेन्स )की ये सारी छोटी-छोटी हरकते हमारे बुनियादी डर को इतना मजबूत बना देती है की  हमारे जीवन के सभी पहलुओ में हावी हो जाता है। नाते रिश्तो  में-काम-धन्धे में भी हम खतरा लेने से परहेज करने लगते है। इसका एक ही इलाज है-ठीक उल्टा करना शुरू करें मगर पहले छोटी बातों से। जब बोलना है। है तो बोले-उचित अवसर का इतजार न करें। मीटिंग में स्वयं ही पहल करे-प्रश्न पूछे विभिन्न जिम्मेदारियो के लिये बलंटियर करें।                                

 ---------------------------------------------------  -------------------- -----------                            C, संचार या प्रवाह ;   
 संचार का बुनियादी अर्थ है अपनी बात दूसरे को समझा पाना। इसके धारा प्रवाह वक्यता होना जरूरी नही मगर संचार सिर्फ बोलना ही नही है- संचार के अन्य पहलुओं पर भी अपनी पकड़ बनाये-मनोयोग से सुन्ना चेहरे व शरीर की भाव भंगिमा (बाड़ी लेंग्वेज ) का समुचित प्रयोग-आँखो से सम्पर्क बनाये रखना आदि। जहां  भी उपयुक्त हो मुस्कराये। अवसर की अनुसार द्व्श्य श्रव्य माध्यम का प्रयोग करें। क्या आप सचमुच दूसरे व्यवित को अपने विचारो से छूना चाहते है-यदि हाँ तो आपका हकलाना कभी बाधा नही बनेगा। ऐसा सकारात्मक सोच बनाये।    

  ----------------------------------------------------------------- --------------------                          D-शांत मन बेहतर संचार ;
 जब बात करना चाहते है तो कथ्य के साथ-साथ कुछ अनचाहे विचार भी मन में चले आते है- यथा-मै इस शब्द पर अट्कूगा या उस शब्द पर। अगर ऐसा हुआ तो श्रोता क्या सोचेगा आदि। इसतरह की दु;चिताये बोलने की प्रक्रिया में बाधक बनती है और वही होता है जिससे मह बचना चाहते थे। ये डर-ये चिताये आखिर आती कहा से है? ये सारे नकारात्मक विचार अतीत में बोलने से जुड़े बुरे अनुभवों से उतपन्न होते है,यहाँ तक की इनका संबंध सुदूर बचपर के अनुभवों से भी हो सकता है। इनसे निपटने का कारगार तरीका है-नियमित आत्म विश्लेषण और ध्यान। हर संस्कति में मनन ,ध्यान के द्धारा उस शान्त मनोदशा में पहुचने की परम्परा है जहां ऐसे काल्पनिक भय व संवेगों से निपटा जा सकता है।

----------------------------------------------------------------------------------------                    E- बोलने का बेहतर तरीका-                                          टेपरिकार्डर-कैमरा-फोन आदि द्धारा किसी से फोन पर बात करते हुये स्वयं को रिकार्ड करें अन्यथा आइने के सामने फोन पर बात करते हुये अपने को देखे।
 जब आप किसी शब्द पर मुश्किल महसूस करते है तब आप क्या करते है? उस क्षण को लम्बा खिचे या पूरीतरह फ्रिज कर दे इसतरह यह जानने का प्रयास करें कि उस क्षण में क्या होता है, आप क्या करते है ?आपकी आवाज कैसी होती है ?आपका चेहरा-हाथ व अन्य भाव-भंगिमा कैसी होती है? क्या गले या सीने की मासपेशियों में ज्यादा तनाव होता है ऐसे क्षणों में ?,क्या हमारी पलके झपकती है?, अब इसी हरकत को दुबारा जान बूझकर करे पूरे अहसास के साथ। पहले धीरे-फिर तेज-कम तनाव फिर बहुत ज्यादा तनाव के साथ आदि। यानि उस अनचाही हरकत /प्रतिक्रिया की खूब गहराई में समझ बनाये और उस पर नियंत्रण बनाना शुरू करे। यह सबकुछ एक आइने के सामने करे। इसीतरह गहरी सास लेकर-सास छोड़ते हुये बोलना भी जरूरी है। हम शब्दों पर अटकने के डर से पहले ही अपनी सांस को रोकना शुरू कर देते है। यह वाणी के लिये बुरा है। पेट से (सीने के बजाय )निरंतर गहरी सांस लेते रहना मन को तनावमुक्त व हमारे प्रवाह को बेहतर बनाता है। इसीतरह मौन के क्षणों को भी बातचीत में शामिल करना सीखे।

--------------------------------------------------------------------- -------------------                  F-विविधता को स्वीकार करें-                                                                                                                    अन्ततः समाज क्या कर सकता है इस बारे में? समाज की एक महत्वपूर्ण भूमिका है। हकलाने से जुडी समस्या का लगभग 90 % सामाजिक प्रतिकियाओ पर निभर्र है। कई पी-डब्ल्यू-एस-ने इस बात को स्वीकार किया है कि अगर उनका परिवार-साथी व अन्य परिजन उनके हकलाने को खुले मन से स्वीकार करते है तो उनकी समस्या कही ज्यादा आसान हो जाती। क्या हम हकलाने को जीवन की अन्य विविधताओं की तरह स्वीकार कर सकते है? इसके बारे में बात कर सकते है? व्यवहार में इसका मतलब होगा -                                                            

1-जब आप किसी पी डब्ल्यू एस से बात करे तो खुद धीरे और आराम से बात करें।                                          

2-अपनी निगाहे न फेरे। ध्यान निरंतर उसकी बात पर रखे न कि चेहरे की असामान्य प्रतिक्रियाओं पर।        

 3-समझ न आने पर जरूर पूछे पर उसकी बात बीच में न काटे। उसे आपकी बात आराम से कहने दे।      

 4-ऐसे बच्चो से बात रते समय बहुत से सवाल एक साथ न पूछे। उन्हें अपनी बात पूरी करने दे-फिर कुछ छण रुके और तब आराम से पूछे।                                                                      5- बच्चे की समस्या पर वस्तुनिष्ठ ढ़ग से चर्चा करें-कभी इसका मजाक न बनाए।